विधानसभा चुनाव : गोरखालैंड में 'फूट डालो, राज करो' की नीति? - बीबीसी रिपोर्ट
सलमान रावी बीबीसी संवाददाता,
दार्जिलिंग से
उत्तरी बंगाल के पहाड़ों पर सियासी दलों के बीच घमासान मचा है. यहां गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बिमल गुरुंग को, ख़ुद से टूटकर अलग हुए हड़का बहादुर छेत्री से कड़ी चुनौती मिल रही है. जहां बिमल गुरुंग ने भारतीय जनता पार्टी से समझौता किया है, वहीं छेत्री की 'जन आंदोलन पार्टी' ने तृणमूल कांग्रेस का हाथ थामा है. यही कारण है कि इस बार पहाड़ों पर संघर्ष काफ़ी रोचक है. चुनाव के वक़्त यहां की सड़कों पर अलग गोरखालैंड की मांग का नारा, आम दिनों के मुक़ाबले ज़्यादा सुनने को मिलता है. यहां, यह मांग लोगों की भावना से जुड़ी है, जिसे हर राजनीतिक दल भुनाना चाहता है. एक बार मतदान ख़त्म होने के बाद ये नारे भी फ़ीके पड़ जाते हैं. उसके बाद उत्तर बंगाल के पहाड़ों पर बसने वाले गोरखा और दूसरी पहाड़ी जनजातियों के लोग अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में व्यस्त हो जाते हैं.
यह पहला मौक़ा है जब जीजेएम को विधानसभा चुनावों में अपनों से ही कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. वह 'गोरखालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी' की अगुवाई भी करता है. चुनावों से कुछ महीने पहले, मंच के प्रमुख नेता हड़का बहादुर छेत्री ने पार्टी से किनारा कर लिया था और अपना एक नया संगठन खड़ा कर लिया. उन्होंने मोर्चा को दूसरा झटका तब दिया, जब उन्होंने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस का समर्थन भी हासिल कर लिया. मगर मोर्चा से अलग होकर वो अलग राज्य की मांग को चुनावी मुद्दा बनाते हुए विकास की बात भी कर रहे हैं. वह कहते हैं कि अलग राज्य की मांग तो सबसे पहले है पर वो विकास को भी मुद्दा बना रहे हैं, क्योंकि पहाड़ी लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव झेल रहे हैं. दूसरी तरफ़, सुभाष घीसिंग के गोरखा नेशनल लिबरेशन फ़्रंट यानी जीएनएलएफ़ ने भी हड़का बहादुर छेत्री की 'जन आंदोलन पार्टी' को समर्थन देने की घोषणा कर दी. इससे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को एक और झटका लगा. जीएनएलएफ़ प्रवक्ता एनबी छेत्री कहते हैं कि यह समर्थन सिद्धांतों के आधार पर है.
पहली बार चुनौतियों का सामना कर रहे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा सचिव रोशन गिरी ने बीबीसी को बताया कि पहले उन्होंने ममता बनर्जी को समर्थन दिया था. लेकिन फिर वो आरोप लगाते हैं कि तृणमूल कांग्रेस ने पहाड़ों के लोगों को तोड़ने का काम किया है. गिरी कहते हैं, "ममता बनर्जी 'फूट डालो और राज करो' की नीति पर चल रही हैं. वह पहाड़ के लोगों में फूट डाल रही हैं. उन्होंने शेरपा, लेपचा, लामा आदि जनजातियों के अलग बोर्ड बना दिए. यह तो लोगों को तोड़ने का काम ही हुआ न?" इस बार गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने ख़ुद को तृणमूल कांग्रेस से अलग कर लिया है और उसने भाजपा के साथ हाथ मिलाया है. संगठन को लगता है कि उनकी जो मांग बरसों से लंबित है, उसे केंद्र सरकार ही पूरा कर सकती है. गिरी का यह भी मानना है कि उनका संगठन उत्तर बंगाल के पहाड़ों में एक बड़ी राजनीतिक शक्ति है, इसलिए संगठन में फूट से उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. रोशन गिरी और हड़का बहादुर छेत्री चाहे जितने दावे करें पर इस चुनाव में गोरखालैंड की राजनीति के दो केंद्रों के बीच कांटे की टक्कर का अनुमान लगाया जा रहा है.
उत्तरी बंगाल के पहाड़ों पर सियासी दलों के बीच घमासान मचा है. यहां गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बिमल गुरुंग को, ख़ुद से टूटकर अलग हुए हड़का बहादुर छेत्री से कड़ी चुनौती मिल रही है. जहां बिमल गुरुंग ने भारतीय जनता पार्टी से समझौता किया है, वहीं छेत्री की 'जन आंदोलन पार्टी' ने तृणमूल कांग्रेस का हाथ थामा है. यही कारण है कि इस बार पहाड़ों पर संघर्ष काफ़ी रोचक है. चुनाव के वक़्त यहां की सड़कों पर अलग गोरखालैंड की मांग का नारा, आम दिनों के मुक़ाबले ज़्यादा सुनने को मिलता है. यहां, यह मांग लोगों की भावना से जुड़ी है, जिसे हर राजनीतिक दल भुनाना चाहता है. एक बार मतदान ख़त्म होने के बाद ये नारे भी फ़ीके पड़ जाते हैं. उसके बाद उत्तर बंगाल के पहाड़ों पर बसने वाले गोरखा और दूसरी पहाड़ी जनजातियों के लोग अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में व्यस्त हो जाते हैं.
यह पहला मौक़ा है जब जीजेएम को विधानसभा चुनावों में अपनों से ही कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. वह 'गोरखालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी' की अगुवाई भी करता है. चुनावों से कुछ महीने पहले, मंच के प्रमुख नेता हड़का बहादुर छेत्री ने पार्टी से किनारा कर लिया था और अपना एक नया संगठन खड़ा कर लिया. उन्होंने मोर्चा को दूसरा झटका तब दिया, जब उन्होंने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस का समर्थन भी हासिल कर लिया. मगर मोर्चा से अलग होकर वो अलग राज्य की मांग को चुनावी मुद्दा बनाते हुए विकास की बात भी कर रहे हैं. वह कहते हैं कि अलग राज्य की मांग तो सबसे पहले है पर वो विकास को भी मुद्दा बना रहे हैं, क्योंकि पहाड़ी लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव झेल रहे हैं. दूसरी तरफ़, सुभाष घीसिंग के गोरखा नेशनल लिबरेशन फ़्रंट यानी जीएनएलएफ़ ने भी हड़का बहादुर छेत्री की 'जन आंदोलन पार्टी' को समर्थन देने की घोषणा कर दी. इससे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को एक और झटका लगा. जीएनएलएफ़ प्रवक्ता एनबी छेत्री कहते हैं कि यह समर्थन सिद्धांतों के आधार पर है.
पहली बार चुनौतियों का सामना कर रहे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा सचिव रोशन गिरी ने बीबीसी को बताया कि पहले उन्होंने ममता बनर्जी को समर्थन दिया था. लेकिन फिर वो आरोप लगाते हैं कि तृणमूल कांग्रेस ने पहाड़ों के लोगों को तोड़ने का काम किया है. गिरी कहते हैं, "ममता बनर्जी 'फूट डालो और राज करो' की नीति पर चल रही हैं. वह पहाड़ के लोगों में फूट डाल रही हैं. उन्होंने शेरपा, लेपचा, लामा आदि जनजातियों के अलग बोर्ड बना दिए. यह तो लोगों को तोड़ने का काम ही हुआ न?" इस बार गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने ख़ुद को तृणमूल कांग्रेस से अलग कर लिया है और उसने भाजपा के साथ हाथ मिलाया है. संगठन को लगता है कि उनकी जो मांग बरसों से लंबित है, उसे केंद्र सरकार ही पूरा कर सकती है. गिरी का यह भी मानना है कि उनका संगठन उत्तर बंगाल के पहाड़ों में एक बड़ी राजनीतिक शक्ति है, इसलिए संगठन में फूट से उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. रोशन गिरी और हड़का बहादुर छेत्री चाहे जितने दावे करें पर इस चुनाव में गोरखालैंड की राजनीति के दो केंद्रों के बीच कांटे की टक्कर का अनुमान लगाया जा रहा है.





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