Kill Dill Review: ये वो कमबैक नहीं है जिसका गोविंदा को इंतज़ार था
किल दिल में अपने एंट्री सीन पर गोविंदा कहते हैं 'अगर
मूंगफली में छिलके और लड़की में नखरे ना होते, तो ज़िंदगी कितनी आसान
होती.' इसी डायलॉग को आगे बढ़ाते हुए, फिल्म किल दिल को एक लाइन में कुछ यू
बयां किया जा सकता है- ‘अगर बॉलीवुड में नई कहानियां लिखी जातीं और यशराज
फिल्म्स बार-बार नए पैकेट में पुराना माल ना भरता, तो हिंदी सिनेमा कितना
बेहतर हो जाता.’ अपनी पिछली
सुपरफ़्लॉप फिल्म झूम बराबर झूम के 7 साल बाद निर्देशक शाद अली ने किल दिल
बनाई है. लेकिन फिल्म देखकर आप हैरान रह जाएंगे कि आख़िर ये कहानी लिखने
में उन्हें सात साल क्यों लगे? ज़रा कहानी सुन ही लीजिए.
कहानी
भैयाजी (गोविंदा) एक गैंग लीडर है और उन्हें एक साथ दो बच्चे कूड़े के ढेर
में पड़े मिलते हैं. भैयाजी इन्हें पालते हैं. खून-खराबे के माहौल में पले
ये बच्चे देव (रणवीर) और टूटू (अली ज़फ़र) भैयाजी के वफ़ादार शूटर बनते
हैं. भैयाजी के एक इशारे पर ये किसी भी जान ले लेते हैं. ज़िंदगी ठीक-ठाक
गुज़र रही होती है कि तभी देव की मुलाकात दिशा (परिणीति चोपड़ा) से होती
है. दोनों में प्यार होता है और अब अचानक देव जुर्म की ज़िंदगी छोड़ कर
अच्छा आदमी बनना चाहता है (है ना नई कहानी!!!) तो भैयाजी को ये मंज़ूर
नहीं.
वो देव को पहले तो ख़तरनाक गैंगस्टर की तरह धमकाते हैं.
मगर जब वो नहीं मानता तो आख़िर में किसी घटिया टेलीविजन सीरियल की विलेन
सास की तरह भैयाजी देव और दिशा में ग़लतफहमियां पैदा कर देते हैं. अब
दर्शकों को इंतज़ार था कि अंत तक आते आते फिल्म में मार-धाड़ होगी,
डायलॉगबाज़ी होगी, मगर इससे फिल्म अचानक ख़त्म हो जाती है. जी हां जिस तरह
ऊपर कहानी अचानक ख़त्म हुई, ठीक वैसे ही एक झटके से फिल्म ख़त्म हो जाती
है. पूरी फिल्म किसी आम
मसाला फिल्म की तरह घिसे हुए ढर्रे पर चलती है. अंत में शायद शाद अली ने
कुछ नया करने की सूझी मगर कम से कम मेरे साथ थिएटर में बैठे ज़्यादातक
दर्शकों को ये नयापन नहीं भाया.
अभिनय
फिल्म
पूरी तरह रणवीर सिंह के कंधो पर है और घिसी-पिटी कहानी के बावजूद रणवीर कम
से कम पहले भाग में तो फिल्म को संभाल गए हैं. अली ज़फ़र के साथ उनके कई
मज़ेदार सीन हैं. अली ज़फ़र शूटर के रोल में बहुत अच्छे लगे हैं और उन्हें
अच्छी लाइने भी मिली हैं. हालांकि अपने रोल के मुताबिक वो बिना-पढ़े लिखे
शख़्स बिलकुल नहीं लगे. नयापन ना होने के बावजूद भी शुरुआत के एक घंटे
फिल्म मनोरंजन करती है. लेकिन इंटरवल के बाद अचानक ना जाने क्या हो जाता
है. परिणीति वैसी ही लगी है
जैसी वो अपनी हर फिल्म में लगती हैं लेकिन इस फिल्म में उनके मेकअपमैन और
डिज़ायनर ने उन्हें खराब दिखाने के लिए भरपूर मेहनत की है. अपने गुस्से और
प्यार का इज़हार करने के लिए बात-बात पर नाचने वाले गैंगस्टर के रूप में
गोविंदा का रोल बेहद कमज़ोर लिखा गया है.
फिल्म के प्रोमो और प्रोमोशन में
गोविंदा के रोल से उम्मीद जगी थी. उनके डायलॉग ज़रूर बढ़िया हैं लेकिन वो
इतने कम हैं कि असर नहीं छोड़ते. फिल्म
में रणवीर पर बरसते हुए उनका सिर्फ़ एक लंबा सीन है जिसमें वो दिखा देते
हैं कि क्यों आज भी उनके इतने चाहने वाले हैं. अफ़सोस किलदिल बिलकुल वो
कमबैक नहीं है जिसका उन्हें इंतज़ार था. फिल्म
में शंकर-एहसान-लॉय का संगीत है मगर इस फिल्म में कई गीत क्यों है ये
बिलकुल समझ नहीं आता. बोझिल होती फिल्म को रोमांटिक गीत और बोझिल कर देते
हैं. फिल्म के वही दो गीत अच्छे लगते हैं जिनमें गोविंदा नाचते नज़र आते
हैं.
शाद अली ने शुरुआत में
साथिया और बंटी और बबली जैसी मनोरंजक फिल्में बनाई थीं. बंटी और बबली वाला
ह्यूमर किल दिल में भी कई जगह नज़र आता है और फिल्म के वही हिस्से अच्छे
भी हैं. फिल्म का सबसे मज़बूत पहलू हैं रणवीर सिंह और कुछ तालियों वाले
डायलॉग. एक और ख़ास बात,
कहानी के 3-4 अहम मोड़ पर गीतकार गुलज़ार की आवाज़ में कुछ खूबसूरत लाइनें
सुनाई देती हैं. ये आवाज़ और उसमें गूंजते लफ़्ज़ भारी हैं, फिल्म हल्की.


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