खाराखेत के सत्याग्रही : वीर गोरखा खड़क बहादुर सिंह बिष्ट की 126वीं जयंती
दीपक राई
वीर गोरखा न्यूज़ नेटवर्क
देहरादून के पछवादून क्षेत्र के इतिहास में खाराखेत गांव का नाम स्वर्ण अक्षरों में है। देहरादून से लगभग 18 किमी दूर, सहसपुर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत बिधौली से आगे नून नदी के किनारे बसा यह छोटा सा गांव 1930 में गांधीजी के नमक कानून तोड़ो आंदोलन का उत्तराखंड में सबसे बड़ा केंद्र बना था। और इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर से जोड़ने वाले सेनानी थे - सत्याग्रही खड़क बहादुर सिंह बिष्ट।
आज उनकी 126 वीं जयंती है। इन्हें इतिहास में गोरखा खड़क बहादुर के नाम से भी याद किया जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह में गोरखा खड़क बहादुर सिंह बिष्ट सीधे शामिल रहे थे। उन्होंने साबरमती आश्रम जाकर दांडी आंदोलन में भाग लिया और नमक डिपो पर धरना भी दिया। यह उस दौर की बात है जब 12 मार्च 1930 को 62 वर्ष की उम्र में गांधीजी 78 साथियों के साथ साबरमती से दांडी के लिए निकले थे। देशभर से सत्याग्रही उनसे जुड़ रहे थे।इन्होंने ना सिर्फ 241 किमी की ऐतिहासिक यात्रा पूरी की, बल्कि 6 अप्रैल को समुद्र किनारे नमक बनाकर कानून तोड़ने के बाद सरोजनी नायडू के नेतृत्व में गुजरात के धरासणा नमक डिपो पर हुए ऐतिहासिक धरने में भी उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व किया।
खड़क बहादुर सिंह बिष्ट के बारे में यह भी प्रसिद्ध है कि उन्होंने कोलकाता में एक साहूकार के चंगुल से एक नेपाली युवती को बलात्कार होने से बचाया और उस दुष्ट साहूकार का वध किया। बाद में उन्हें अंग्रेजी हुकूमत द्वारा जनसमर्थन के चलते रिहा किया। खड़क बहादुर सिंह बिष्ट गोरखा समुदाय से आते थे। ब्रिटिश फौज में गोरखाओं की भर्ती आम थी, लेकिन उन्होंने फौजी नौकरी की जगह गांधीजी का अहिंसक मार्ग चुना - इसी कारण गोरखा समाज में उन्हें आज भी ‘वीर गोरखा’ कहा जाता है। उत्तर नाट्य संस्थान ने उनके जीवन पर "दांडी से खाराखेत" नामक नाटक भी मंचित किया है, जो दर्शाता है कि कैसे दांडी का अनुभव लेकर वे सीधे देहरादून के आंदोलन से जुड़े। खाराखेत में नमक सत्याग्रह का एक प्राकृतिक आधार था - यहां बहने वाली नून नदी। ‘नून’ का अर्थ ही नमक है, इसका पानी प्राकृतिक रूप से खारा-नमकीन है। इसी कारण गांधीजी के आह्वान पर देहरादून के स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे नमक बनाने के लिए चुना। जगह का चयन और योजना में खड़क बहादुर जैसे अनुभवी सत्याग्रही की बड़ी भूमिका थी, जिन्होंने दांडी में नमक बनाने की तकनीक प्रत्यक्ष देखी थी।
20 अप्रैल 1930 की दोपहर अखिल भारतीय नमक सत्याग्रह समिति के बैनर तले खड़क बहादुर सिंह बिष्ट के नेतृत्व में नरदेव शास्त्री, महावीर त्यागी और साथियों की अगुआई में सत्याग्रही खाराखेत में एकत्रित हुए और नमक बनाकर ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दी।आंदोलनकारियों ने 7 मई 1930 तक 6 टोलियों में, कुछ रिकॉर्ड के अनुसार 10 जत्थों में नून नदी पर नमक बनाया। फिर उसे देहरादून शहर के टाउन हॉल में बेचते हुए गिरफ्तारी दी। ब्रिटिश साल्ट लॉ 1882 तोड़ने पर उन्हें 6 महीने तक की सजा हुई।
इस जत्थे में खड़क बहादुर सिंह बिष्ट के साथ हुकम सिंह, अमर सिंह, रीठा सिंह, कृष्ण दत्त वैद्य, नारायण दत्त, नत्थूराम, ध्रुव सिंह, स्वामी विचारानंद जैसे 140 से अधिक सत्याग्रही शामिल थे, जिनकी सूची डॉ. ललता प्रसाद की पुस्तक ‘खाराखेत का नमक सत्याग्रह’ में दर्ज है। दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में इस पुस्तक पर हुई चर्चा में यह कहा गया कि खाराखेत संभवतः उत्तराखंड के स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा आंदोलन था, लेकिन इसे इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला।
खाराखेत में जिस स्थान पर नमक बनाया गया था, वहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का स्तंभ और सत्याग्रहियों के नाम अंकित हैं। 85वीं वर्षगांठ पर उत्तराखंड राज्य अभिलेखागार ने वहां एक प्रदर्शनी लगाई और इस स्थल को याद किया। हाल के वर्षों में शहीद मेजर दुर्गा मल्ल मेमोरियल ट्रस्ट के तत्वावधान में खाराखेत मेले का आयोजन होता है। इसी मेले में कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने स्वतंत्रता सेनानी वीर खड़क बहादुर बिष्ट की प्रतिमा का अनावरण किया और उनकी स्मृति में शहीद खड़क बहादुर वाटिका बनाने की घोषणा की। आज भी हर साल उनकी स्मृति में रायपुर ने अमर शहीद खड़क बहादुर बिष्ट स्मृति फुटबॉल टूर्नामेंट देहरादून में आयोजित होता है।
राष्ट्रीय और स्थानीय आंदोलन के सेतु: वे उन गिने-चुने उत्तराखंडी थे जो दांडी में गांधीजी के साथ चले और फिर वही अनुभव खाराखेत में लेकर आए। ब्रिटिश इंडियन आर्मी में गोरखाओं की बहादुरी की कहानियां तो बहुत हैं, पर अहिंसक सत्याग्रह में गोरखा भागीदारी का प्रतीक खड़क बहादुर हैं। उपेक्षित इतिहास की याद: खाराखेत सत्याग्रह स्थल तक आज भी पक्की सड़क नहीं है और स्मारक लैंटाना झाड़ियों में घिरा रहता है, यह बात खुद ट्रिब्यून की रिपोर्ट में दर्ज है। खड़क बहादुर की कहानी इस स्थल को बचाने की प्रेरणा देती है।
देहरादून का खाराखेत सिर्फ नमक नहीं, स्वाभिमान का प्रतीक है - और खड़क बहादुर सिंह बिष्ट उस स्वाभिमान के पहरेदार।

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