21 अक्टूबर 1962 : महावीर चक्र विजेता नायक रबी लाल थापा की शौर्यगाथा
दीपक राई
वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क
भारतीय सेना के इतिहास में 1962 का भारत-चीन युद्ध एक कठिन परीक्षा था, और लद्दाख के चुशुल सेक्टर में पैंगोंग त्सो झील के किनारे लड़ी गई सिरिजाप की लड़ाई उस परीक्षा की सबसे वीर गाथाओं में से एक है। इसी लड़ाई के नायक हैं नायक रबी लाल थापा, जिन्हें उस समय नायक के पद पर रहते हुए असाधारण वीरता के लिए भारत के दूसरे सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
30 दिसंबर 1925 को तुला राम थापा के घर जन्में रबी लाल 30 दिसंबर 1943 कों मात्र 18 वर्ष की आयु में ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए। वह 1/8 गोरखा राइफल्स - जो आज 3 मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री के रूप में जानी जाती है, में सेवारत रहे। यह रेजिमेंट 1815 से अपने 'काफर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो' - कायर की तरह जीने से अच्छा मरना है - के आदर्श के लिए प्रसिद्ध है। सैन्य सेवा के दौरान रबी लाल का सर्विस नंबर 5733537 रहा। 1962 के युद्ध में कार्रवाई के समय नायक, बाद में नायब सूबेदार और मानद सूबेदार के पद तक पदोन्नत रहे।
{ 1962 - सिरिजाप पोस्ट की पृष्ठभूमि }
जून 1962 में ब्रिगेड कमांडर ब्रिगेडियर रॉविंदर सिंह ग्रेवाल ने पैंगोंग त्सो के उत्तरी किनारे पर अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए सिरिजाप में पोस्ट स्थापित करने का आदेश दिया। यह काम 1/8 गोरखा राइफल्स की डेल्टा कंपनी को दिया गया था। यह इलाका बेहद कठिन था। सिरिजाप का भारतीय पोस्ट स्टॉर्म बोट - छोटी नावों - से ही सप्लाई होता था, जमीन से चुशुल गैरीसन से कोई संपर्क नहीं था। जबकि चीनी सेना के पास खुर्नक फोर्ट से सीधी सड़क, भारी हथियार और टैंक थे, भारतीय जवानों के पास सिर्फ व्यक्तिगत हथियार और LMG थे। अगस्त 1962 में मेजर धन सिंह थापा को सिरिजाप में कंपनी कमांडर बनाकर भेजा गया।
{ 21 अक्टूबर 1962 - वो दिन जिसने बनाया इतिहास }
20-21 अक्टूबर की रात को चीनी सेना ने पूरे लद्दाख में हमला कर दिया। 21 अक्टूबर 1962 को सिरिजाप पोस्ट पर अचानक भारी तोप और मोर्टार की बमबारी शुरू हुई। वायरलेस सेट टूट गया और पोस्ट का बेस से संपर्क कट गया। तभी नायक रबी लाल थापा, जो उस समय पैंगोंग झील क्षेत्र में ही एक अन्य पोस्ट के कमांडर थे, स्वयं आगे आए।
{ पहला मिशन - टोही अभियान }
उन्होंने एक स्टॉर्म बोट में सिरिजाप जाकर ताजा स्थिति की जानकारी लाने का स्वैच्छिक प्रस्ताव रखा। जब वे पोस्ट से लगभग 1,000 गज की दूरी पर थे, दुश्मन ने उन्हें देख लिया और तीन अलग-अलग दिशाओं से फायरिंग शुरू कर दी। नाव को भारी नुकसान पहुँचा, फिर भी अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना वे आगे बढ़ते रहे और महत्वपूर्ण जानकारी लेकर वापस लौटे।
{ दूसरा मिशन - जीवन बचाने वाला अभियान: }
उसी शाम को पता चला कि युला पोस्ट खतरे में है। नायक थापा ने फिर से अपनी जान जोखिम में डालकर वहाँ जाने की पेशकश की। उन्होंने सभी घायलों और बचे हुए जवानों को निकालने की जिम्मेदारी ली। वापसी के दौरान उनकी दोनों नावें दुश्मन की फायरिंग की चपेट में आ गईं और एक नाव डूब गई। इस विकट स्थिति में नायक थापा ने खुद तैरकर डूबते हुए साथियों को बचाया और उन्हें किनारे तक पहुँचाया। इसी अभियान में मेजर धन सिंह थापा की कंपनी के 7 जवानों को, जो रात के अंधेरे में चीनी घेरे से बचे थे, और युला-III के अन्य जवानों को सुरक्षित निकाला जा सका।
बाद में पता चला कि सिरिजाप-I पर गोला-बारूद खत्म होने के बाद गोरखा जवानों ने खुकरी निकाल ली थी और "जय माँ काली, आयो गोरखाली" के नारे के साथ अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी थी। 28 में से केवल 7 जवान जीवित बचे थे। चीनी सैनिकों ने गंभीर रूप से घायल जवानों को लाइन में खड़ा करके गोली मार दी थी। इस पूरे युद्ध में गोरखा रेजिमेंट ने कुल 33 जवान खोए। इसी लड़ाई में तीन वीरता पुरस्कार दिए गए - 'राइफलमैन तुलसीराम थापा को वीर चक्र, नायक रबी लाल थापा को महावीर चक्र, और मेजर धन सिंह थापा को परमवीर चक्र'।
{ महावीर चक्र प्रशस्ति-पत्र }
भारत सरकार के गैलेंट्री अवार्ड्स के आधिकारिक दस्तावेज में उनका प्रशस्ति-पत्र इस प्रकार दर्ज है:
'नायक रबी लाल थापा ने दुश्मन के सामने उच्च कोटि के साहस और कर्तव्यनिष्ठा का प्रदर्शन किया। जब सिरिजाप पोस्ट का संपर्क टूट गया, तो उन्होंने स्वेच्छा से स्टॉर्म बोट में जाकर टोही की। दुश्मन की तीन तरफ से हो रही फायरिंग में नाव क्षतिग्रस्त होने के बावजूद वे नवीनतम जानकारी लेकर लौटे। उसी शाम जब एक अन्य पोस्ट पर खतरा था, तो उन्होंने फिर से स्वयं को प्रस्तुत किया और घायलों को निकालते समय जब नावें डूब गईं तो अपनी जान की परवाह न कर साथियों की जान बचाई।'
उनकी कार्रवाई की तिथि 21 अक्टूबर 1962 दर्ज है और ऑपरेशन का नाम Operation Leg Horn था।
{ गोरखा परंपरा के सच्चे प्रतिनिधि }
नायक रबी लाल थापा सिर्फ एक सैनिक नहीं, बल्कि गोरखा परंपरा के प्रतीक हैं। 1962 के बाद भी उन्होंने सेना में सेवा जारी रखी और सम्मान के साथ सेवानिवृत्त हुए। एक साधारण पहाड़ी गाँव से निकलकर भारतीय सेना के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार तक का उनका सफर आज भी उत्तराखंड और पूरे गोरखा समुदाय के युवाओं के लिए प्रेरणा है। आज जब हम पैंगोंग त्सो के फिंगर्स की बात करते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि उस झील के पानी में नायक रबी लाल थापा जैसे वीरों के साहस की कहानी भी बहती है, जिन्होंने बिना सड़क, बिना भारी हथियारों के, सिर्फ नाव और खुकरी के भरोसे देश की आन बचाए रखी।

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