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देहरादून के वीर सपूत - आजाद हिन्द फौज के स्वतंत्रता सेनानी बिशन सिंह की गुमनाम गाथा


दीपक राई 
वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क 

देहरादून की गढ़ी कैंट की माटी ने देश को कई वीर सपूत दिए हैं, उन्हीं में से एक अमर नाम है स्वतंत्रता सेनानी श्री बिशन सिंह जी का। उनका जीवन देशभक्ति, त्याग और अदम्य साहस की एक जीवंत मिसाल है। बिशन सिंह जी का जन्म अगस्त 1922 में गढ़ी कैंट, देहरादून में हुआ था। गढ़ी कैंट देहरादून का वह ऐतिहासिक क्षेत्र है जो गोरखा समुदाय का गढ़ माना जाता है। सन 1814-15 के गोरखा-अंग्रेज युद्ध के बाद बसे इस क्षेत्र के हर घर से एक सैनिक निकलता है। ऐसे ही वीर भूमि में जन्मे बिशन सिंह में बचपन से ही देश और समाज की सेवा का जज्बा था।

{ सैन्य जीवन की शुरुआत 2/9 गोरखा राइफल्स से }

वर्ष 1940 में वे ब्रिटिश भारतीय सेना की प्रतिष्ठित 9 गोरखा राइफल्स की दूसरी बटालियन (2/9 GR) में भर्ती हुए। 9 गोरखा राइफल्स अपनी वीरता और "कायर हूनु भन्दा मर्नु राम्रो" के आदर्श के लिए विश्व प्रसिद्ध है। उन्होंने इस बटालियन में सिपाही के रूप में सेवा दी। यह वह दौर था जब द्वितीय विश्व युद्ध अपनी चरम पर था और 9 गोरखा राइफल्स को दक्षिण-पूर्व एशिया मोर्चे पर तैनात किया गया था।

{ युद्ध का मोर्चा और जापान में युद्धबंदी (1941-1942) }

1941 में जापान ने ब्रिटिश उपनिवेशों मलाया और सिंगापुर पर आक्रमण किया। सिंगापुर की लड़ाई में हजारों भारतीय सैनिक जापानी सेना द्वारा युद्धबंदी (P.O.W.) बनाए गए। बिशन सिंह भी 1941-1942 में जापान के P.O.W. कैंप में बंदी रहे। यही वह कठिन समय था जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी। जापानी कैंपों में बंदी भारतीय सैनिकों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी, लेकिन वहीं पर कैप्टन मोहन सिंह और बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आह्वान पर एक नई सेना का जन्म हो रहा था।

{ आजाद हिन्द फौज में देश की असली सेवा (1942 - 1945) }

जापानी कैंप से ही उन्होंने अंग्रेजों की गुलामी छोड़कर मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए लड़ने का प्रण लिया और 1942 में आजाद हिन्द फौज (Indian National Army - INA) में शामिल हो गए। 1942 से 1945 तक वे INA के वीर सिपाही रहे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में उन्होंने "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" के नारे के साथ भारत-बर्मा मोर्चे पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाया। देहरादून-गढ़ी कैंट के सैकड़ों गोरखा युवाओं की तरह उन्होंने भारत की आजादी में अपना योगदान देना चुना, यह साबित करते हुए कि गोरखा केवल बहादुर सिपाही ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के सजग प्रहरी भी थे, है और रहेंगे।

{ फिर अंग्रेजों की कैद (1944-1946) }

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार और 1945 में INA के आत्मसमर्पण के बाद अंग्रेज सरकार ने INA सैनिकों को देशद्रोही करार दिया। बिशन सिंह को भी 1944-1946 तक अंग्रेजी सरकार द्वारा P.O.W. के रूप में बंदी बनाकर रखा गया। लाल किले में चले ऐतिहासिक INA ट्रायल्स के दौरान पूरे देश ने इन सैनिकों के साथ एकजुटता दिखाई। अंततः जन-आक्रोश के कारण अंग्रेजों को इन्हें रिहा करना पड़ा।

{ अंतिम जीवन और विरासत }

देश आजाद होने के बाद वे सादगीपूर्ण जीवन जीते हुए गढ़ी कैंट में ही रहे। मई 1978 में इस वीर सपूत का निधन हो गया। आज भले ही इतिहास की किताबों में उनका नाम बड़े अक्षरों में न हो, लेकिन देहरादून के गढ़ी कैंट की हर गली, और विशेषकर गोरखा समुदाय, उनके बलिदान को नमन करता है। वे उन हजारों गुमनाम आजाद हिन्द फौज (INA) वीरों में से एक हैं जिनके त्याग की नींव पर आज का स्वतंत्र भारत खड़ा है। भारत माँ का का यह लाल, दो-दो बार युद्धबंदी बना, पर झुका नहीं। एक बार दुश्मन देश के सामने, और दूसरी बार अपने ही देश में अंग्रेज हुकूमत के सामने।

वीर गोरखा न्यूज़ नेटवर्क ऐसे गुमनाम गोर्खाली स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियों को सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध है। 

जय हिन्द! जय गोरखा!

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