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देहरादून का ऐतिहासिक लाल गेट : 200 सालों के अदम्य गोरखा शौर्य की गौरवशाली निशानी

दीपक राई 
वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क 

देहरादून में स्थित ऐतिहासिक लाल गेट देहरादून छावनी क्षेत्र का मुख्य प्रवेश द्वार है, लेकिन इसका इतिहास सीधे 1814 के ऐतिहासिक नालापानी के युद्ध से जुड़ा है। देहरादून का गोरखाओं और गोर्खाली सेना से नाता कोई नया नहीं है, बल्कि यह रिश्ता आंग्ल-गोरखा युद्ध और उससे भी पहले 1790 के दशक में गोर्खालियों द्वारा कुमाऊं और गढ़वाल पर की गई विजय से जुड़ा है। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 1814 के पतझड़ में, अक्टूबर-नवंबर के महीने में, आज के देहरादून के बाहरी इलाके में स्थित खलंगा किले, नालापानी में एक ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया था। एक तरफ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना थी, जिसका नेतृत्व जनरल रोलो गिलेस्पी कर रहे थे, तो दूसरी तरफ कैप्टन बलभद्र कुंवर के नेतृत्व में वीर गोर्खाली सेना। यह युद्ध गोरखा शौर्य और बलिदान की अमर गाथा बन गया।

इतिहास का सबसे दिलचस्प मोड़ इसके कुछ ही महीनों बाद आया। 1815 के वसंत में, नाहन, सिरमौर रियासत में, जो देहरादून से लगभग 92 किलोमीटर दूर है, लेफ्टिनेंट फ्रेडरिक यंग ने सिरमूर बटालियन की पहली भर्ती शुरू की। हैरानी की बात यह है कि यंग ने खुद पहले गोरखालियों के खिलाफ युद्ध लड़ा था, जबकि उनकी बटालियन में भर्ती होने वाले पहले सैनिक वे ही थे जिन्होंने खलंगा में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी! इतिहास सच में खुद को अजीब तरह से दोहराता है।

यही सिरमूर बटालियन आगे चलकर भारतीय सेना की सबसे प्रतिष्ठित रेजीमेंट्स में से एक - 2nd King Edward VII's Own Gurkha Rifles बनी, जिसका देहरादून से गहरा और अटूट संबंध रहा है। आज भी देहरादून के चारों ओर गोर्खाली विरासत, गोरखा रेजीमेंट और गोरखा समुदाय की यादें बिखरी पड़ी हैं। उत्तर में जोहड़ी से लेकर पश्चिम में बीरपुर तक, दक्षिण में क्लेमेंट टाउन से लेकर पूर्व में खलंगा-नालापानी किले तक, हर जगह गोरखा इतिहास के निशान मौजूद हैं। दुख की बात है कि उचित देखभाल और सुलभ जानकारी के अभाव में देहरादून क्षेत्र में गोरखाओं का यह समृद्ध इतिहास, विरासत और गौरव धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है। इस धरोहर को सहेजना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
1814-15 में जब आंग्ल-गोरखा युद्ध चल रहा था, तो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की 3500 सैनिकों की सेना ने जनरल रोलो गिलेस्पी के नेतृत्व में देहरादून पर हमला किया था। उस समय गढ़वाल-कुमाऊं में गोरखा शासन था। कैप्टन बलभद्र कुंवर थापा के नेतृत्व में सिर्फ 600 गोर्खाली सैनिकों, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे, ने खलंगा किले (नालापानी) में एक महीने से ज्यादा समय तक अंग्रेजों का डटकर सामना किया। इस युद्ध में अंग्रेजों ने जीत तो हासिल कर ली, लेकिन गोरखाओं की वीरता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने खुद अपने दुश्मन के सम्मान में एक स्मारक बनवाया - यही खलंगा युद्ध स्मारक है। इसे दुनिया के युद्ध इतिहास का एकमात्र ऐसा स्मारक कहा जाता है जो जीतने वाली सेना ने अपने विरोधी के लिए बनवाया हो।

युद्ध के बाद देहरादून में बड़ी संख्या में गोरखा सैनिक मौजूद थे। अंग्रेजों ने उन्हें अपनी सेना में शामिल किया और 1815 में सिरमूर बटालियन की स्थापना की। पहले इनकी बैरकें आज के परेड ग्राउंड और रेंजर्स कॉलेज में थीं। शहर में नगरपालिका बोर्ड बनने के बाद 1872 में बिंदाल नदी के पार 552 एकड़ जमीन पर नई छावनी बसाई गई। इसी छावनी के प्रवेश मार्ग पर एंग्लो-गोरखा युद्ध की याद में एक स्मारक द्वार बनाया गया, जो अपने लाल रंग के कारण लाल गेट के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

सन 1815 में सिरमूर बटालियन की स्थापना का वर्ष था। इसके ठीक एक सौ साल बाद अंग्रेजों ने सन 1915 में प्रथम विश्व युद्ध में गोरखा रेजिमेंट्स के अदम्य शौर्य को सम्मान देने के उद्देश्य से इस लाल गेट का निर्माण करवाया। उसके बाद 200 वर्ष सम्पूर्ण होने के ऐतिहासिक अवसर पर साल 2015 में इस गेट का जीर्णोद्धार किया गया और इसे एक विरासत स्मारक के रूप में नया रूप दिया गया। आज इस गेट की चारों दीवारों पर उन सैकड़ों गोरखा और ब्रिटिश सैनिकों के नाम संगमरमर पर लिखे हैं जिन्होंने इस क्षेत्र में अपनी जान दी। यह गेट आज भी गढ़ी कैंट की शान है और देहरादून में बसे लाखों गोरखा परिवारों के लिए अपने पूर्वजों के बलिदान की जीवंत यादगार है।

वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क दो दशक से सतत भारतीय गोर्खाली इतिहास एवं समाज के उन गुमनाम पहलुओं को रिसर्च के माध्यम से जनमानस तक पहुंचाता रहता है। इस कार्य को अपना आर्थिक सहयोग देकर और अधिक मजबूत बनाने का अपील भी करता है।

जय हिन्द...जय गोरखा...

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